ये है असल गुरूजी, हाथ नहीं है तो पैरों से ही लिखते हैं बोर्ड पर

कुछ कर गुजरने की प्रबल इच्छा के आगे लाचारी किस तरह नतमस्तक होती है, हरिदत्त शर्मा इसकी जीती जागती मिसाल है। तो चलिए इनकी कहानी जानते है।

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जयपुर। कहते है कि जब किसी के सिर पर जुनून सवार हो जाता है तो फिर उसके लिए कोई भी लाचारी या बेबसी खुद घुटने टेक देती है। ऐसा ही एक उदाहरण हम आज आपको हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव मालगी में कार्यरत शिक्षक हरिदत्त शर्मा जी का दे रहे है। बता दे कि हरिदत्त जी कोई आम टीचर नहीं है। इनके दोनों हाथ नहीं है। सो एक दिव्यांग अध्यापक होकर भी वे किसी सामान्य टीचर से कम नहीं है।

जी हां, हरिदत्त जी जैसे गुरूजी ही सही मायने में इस घोर कलयुग में शिक्षक जैसे महान और पवित्र पेशे की गरिमा को बनाए हुए है। वरना सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के हालात से तो हम सब अच्छी तरह वाकिफ है। हरिदत्त शर्मा जैसे टीचर ना केवल अपने बच्चों के लिए बल्कि समूचे समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। मालगी गांव के सरकारी स्कूल में तैनात हरिदत्त के दोनों हाथ नहीं है। मगर हरिदत्त ने कभी भी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

दिव्यांग गुरू जी हरिदत्त ग्रामीण बच्चों को अपने पैरों से पढ़ाते हैं। दरअसल हाथ ना होने के बाद भी हरिदत्त बच्चों को पढाने, उनकी उत्तर पुस्तिकाएं जांचने, ब्लैकबोर्ड पर लिखने, खाने पीने सहित अपने लगभग हर काम को अपने पैरों से बिना किसी की मदद के बखूबी कर लेते हैं। यही वो जिद है जो किसी भी लक्ष्य को पाने की भूख जगाती है।

हरिदत्त शर्मा उन लोगों के लिए एक मिसाल है जो हरवक्त अपनी बेबसी का रोना रोते रहते हैं। हरिदत्त ने दिव्यांग होने के बाद भी लगातार मेहनत करते हुए अपनी योग्यता के दम पर अध्यापक की नौकरी हासिल की। इसके बाद भी वे लगातार बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। धीरे धीरे हरिदत्त ने पैरों से हर काम को करने में मास्टरी हासिल कर ली। दोस्तों हमें ऐसे महान शिक्षक के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।

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